सेकुलरिज्म की मिसाइल थे सर्वानंद कॉल प्रेमी, वहीँ गोली मारी गयी जहाँ लगाते थे तिलक



कश्मीरी पंडित सर्वानन्द कौल : - महान सेक्यूलर व्यक्ति जिनके घर एक बेहद दुर्लभ कुरान होती थी ! ये कश्मीर के तथाकथित आजादी की लड़ाई लड़ने वालों का किस्सा है ।  उम्मीद है पढ़कर सेक्यूलर शर्मायेंगे नहीं।।

-- नाम : - सर्वानन्द कौल प्रेमी (उम्र 64 साल) और उनके पुत्र वीरेंद्र कौल (उम्र 27 साल) -- पेशा : - रिटायर स्कूल मास्टर , सरकारी नौकरी।। -- पता : - सोफ साली , जिला अनंतनाग !! -- कत्ल की तारीख : - 30 अप्रैल सन 1990 ।

अब आगे .... सर्वानन्द कौल प्रेमी कश्मीर के जाने माने कवि भी थे और ज्ञानी माने जाते थे। सेक्युलरिज्म का जमकर प्रचार किया , खूब हिन्दु-मुस्लिम एकता की कथा बाँची और लोगों मे इंसानियत नाम की चीज भी खूब बेंची । 

फिर घाटी मे कश्मीरी हिन्दुओं का कत्ल और आतंक की वारदाते शुरू हुई , उन्हें काश्मीर छोड़ देने का एनाऊंसमेंट किया गया । लेकिन शायद अभी भी सेक्युलरिज्म का कीड़ा उनके भीतर बचा था , उनके रिश्तेदारों ने भी उन्हें घाटी से निकल चलने की सलाह दी। लेकिन प्रेमी जी तो “धर्म-निरपेक्ष” परम्पराओं मे यकीन रखते थे। वे हिन्दु-मुस्लिम से इत्तर इंसानियत के भरोसे बैठे थे ।

उनका ये “धर्म निरपेक्षता” का सपना 29 अप्रैल 1990 की शाम तब टूटा जब कुछ हथियारबंद इस्लामिक आतंकी उनके घर घुस आये। आतंकियों ने घर के सारे सदस्यों को एक कमरे में इकठ्ठा करा दिया। इस्लामिक आतंकियों ने एक सूटकेस मे घर का सारा कीमती जेवर, नगदी, सारी चीजों को भरने का हुक्म दिया। महिलाओ ने जो जेवर पहने थे वो भी इस्लामिक आतंकियों ने छीन लिए।

इस भरे हुए सूटकेस को उठा कर इस्लामिक आतंकियों ने बूढ़े और अशक्त सर्वानन्द कौल को अपने साथ चलने को कहा। आतंकियों का कहना था कि वो सर्वानन्द कौल प्रेमी को थोड़ी देर में छोड देंगे। इस मौके पर उनके बेटे वीरेंद्र कौल को लगा कि बूढे पिताजी अकेले इतना वजन लेकर जायेंगे कैसे ?
अँधेरे में बुजुर्ग अकेला लौटेगा कैसे रात में ?

वीरेंद्र कौल ने पिता के साथ उसे भी साथ ले चलने की गुजारिश की।बाप-बेटा दोनों इस्लामिक आतंकियो के साथ रवाना हुए। दो दिन बाद जब उनकी लाशें मिलीं तो उनकी जो हालत जेहादी आतंकियों ने की थी उसे देखकर एक बार तो हिटलर के नाजी भी शर्मा जायेंगे।

आंखों के ऊपर भौं के ठीक बीच मे जहाँ सर्वानन्द तिलक लगाते थे, वो हिस्सा गर्म सलाख से जला दिया गया था। उनके सारे शरीर से खाल खींच ली गई थी। पूरे शरीर को सिगरेट से दागा गया था | हाथ पांव और अन्य हड्डियाँ तोड़ दी गई थी। बाप और बेटे दोनों की आँखें नोच ली गई थी। उन्हें फांसी पर टांग कर मारा गया था और फिर निश्चिन्त होने के लिए लाशों में गोली भी मार दी गई थी।

सर्वानन्द कौल के घर के पूजाघर में रामायण और गीता के बगल में कुरान नाम की किताब की एक दुर्लभ प्रति रहती थी , इतने बड़े सेक्युलर की मौत भी सेक्युलर मौत ही कहलाई ...... क्योंकि आतंक का तो मजहब तब भी नही था जैसा की आज है । और जब तक वो भटके हुए जेहादी लोकतंत्र में वोटतंत्र के अंग बने रहेंगे तब तक आतंक का कोई मजहब नही होगा और भारत माता की छाती वैसे हीं छलनी होती रहेगी ।।

घटना से शिक्षा : - घटना सिर्फ यही शिक्षा देती है कि सेकुलरिज्म तब काम नहीं आता जब जिहाद का ऐलान हो जाता है, आपका सेकुलरिज्म ऐसी स्तिथि में किसी काम का नहीं रहेगा, सेक्युलरों को विशेष रियायत देने का कोई भी मजहबी फरमान नही है ।।ये जितना जल्दी समझ आ जाए उतना अच्छा है ।