बात 90 के दशक की है।जब सूरत की गली गली में सब भाई रहते थे। हड्डी पर गोश्त नही पर रहमान भाई, फजलूभाई, करिमभाई, अब्दुलभाई, जमीलभाई।इन सब भाई लोगो के जुए के अड्डे,सट्टा मटका ,दारू के धंदे चलते थे। सूरत की सड़कों पर खुली इनकी दादागिरी चलती थी।पूरी रात सड़को पर चाय की महफ़िल चलती थी।और इन महफिलों में क्या प्लानिंग होती होगी ये तो बताने की जरूरत ही नही।
पाकिस्तान के जितने पर खुलेआम बम फोड़ना,जश्न मनाना ये सब एक आम बात थी ये जितने भी भाई थे सब को उनकी कॉम का पुरा सपोर्ट रहता था। आरिफ फ्रुटवाला,आसिफ अमदावादी,अब्दुल लतीफ,मोहम्मद सुरति जो कि गुजरात की कोंग्रेस सरकार में मंत्री भी था।
वही दूसरी तरफ बालक,देवला, डींकि,दिलीप मराठा जैसे हिन्दू डॉन थे।डींकि पारसी था पर उसे लोग हिन्दू ही मानते थे। डींकि का कराटे क्लास चलता था। हलाकी इन लोगो मे कोई गैंगवॉर ज्यादा नही था।पर मुस्लिम गुंडों ने बाबरी मस्जिद के बाद गेंगवोर में भी धर्म घुसेड़ दीया।कोंग्रेस राज में दावूद ने जो बम विस्फोट करवाये थे।उसका असर पूरे देश मे था। मुसलमान डॉन पूरे जोर पर थे बदला लेने के लिए।उन्होंने सबसे पहले हिन्दू ओ के डॉन का खात्मा करना शुरू किया।
मुम्बई में दावूद के इशारे पर हिन्दू गैंगस्टर का ख़ात्मा होने लगा।यहा गुजरात के सूरत में बालक को दिन दहाड़े रेतकर मार दिया गया,उसके बाद डींकि कि उसीके क्लास में गोलियों से हत्या कर दी गई।देवाला को जहर देकर मरवाया गया। इस तरह सूरत में मुस्लिम गैंगस्टरोंका कोई विरोध करने वाला नही रहा। 90 का दशक सच मे बहोत भयंकर था सूरत में।
भला हो 95 के बाद बीजेपी सरकार आई और उन्होंने इन सबका खात्मा किया, और तब से इस्लामिक माफियावाद गुजरात से ख़त्म है, पर अहमद पटेल की सत्ता में वापसी के बाद क्या होगा ये समझना मुश्किल नहीं है
